सुबह के आठ बज गए हैं, लेकिन अखबार नहीं आया। हर रोज छह से सात बजे के बीच आ जाता है। हॉकर भी कहीं नजर नहीं आ रहा। सोचा कि एजेंसी तक चला जाए। वहां सब अखबार भी मिल जाते हैं। यहीं से सभी हॉकर अखबार उठाते हैं। यहां पहुंचकर पता चला कि आज हॉकर नहीं आया. इसलिए सोसाइटी के गेट पर रखवा दिया है। लोग खुद ही अपना अखबार उठा कर ले जाएंगे। आश्चर्य की बात यह है कि बहुत कम लोग अखबार के लिए खुद चल कर सोसाइटी के गेट तक आए, किसी ने शिकायत भी नहीं की। पूछा कि कल-परसों का क्या होगा? एजेंसी वाले ने बताया कि ‘अब हर रोज यही करना पड़ेगा। लड़के नहीं मिल रहे। जितने पैसे हम उन्हें देते थे, उससे दोगुने जोमैटो, क्लिकिट या बिग बास्केट वाले दे रहे हैं। हम तो उतना दे नहीं सकते।”
एक तो कोरोना के बाद वैसे ही अखबारों की बिक्री कम हो गई थी। अब यह नया संकट आ गया है। जाहिर है, यह मेरे लिए एक ऐसी घटना थी, जिससे मन उदास हो गया। ये दिन याद आने लगे, जब अखबार आते ही उरस्के अलग-अलग पन्नो के लिए घर के सदस्न टूट पड़ते थे। सुदूर मुंबई-कोलकाता से आने वाली पत्रिकाओं के लिए टकटकी लगाकर इंतजार किया करते थे।
गोविंद सिंह काही खड़े-खड़े अखबार पलटने लगा तो एक खबर पर मंजर पड़ी। स्कूलों में बयों के लिए अखबार पढ़ना अनिवार्य कर दिया है। हर स्कूल एक हिंदी और एक अंग्रेजी का अखवार मंगव्ाएगा। सुबह प्रार्थना के समय अखचार पढ़ने के लिए दस मिनट का समय अलॉट करना होगा। हर रोज पांच नए या कठिन शब्दों के बारे में बताना होगा।
